September 14, 2020

हिंदी विश्व के माथे की बिन्दी है

हिंदी तुम्‍हें प्रणाम
“””””””””””””””””””””””””
हिन्दी तुम्हें प्रणाम
शत-शत प्रणाम
मैंने सुना था
आस्तीन में सांप पलते हैं
मैं देख रहा हूं
आंचल में सांप पल रहे हैं
और किसी को
नहीं खल रहे हैं
तुम्हें भी नहीं
तुम्हारे धैर्य को प्रणाम
हिन्दी तुम्हें प्रणाम।
मेरी बात कड़ी लगे
तो क्षमा करना
मैं तुम्हें नहीं
अपनी कायरता को कोस रहा हूं
सोच रहा हूं
कब तक
यथास्थितिवाद की धारा में
बहता रहूंगा
तुम्हारा अपमान
सहता रहूंगा
और तुम्हें
अपनी मां भी कहता रहूंगा
और पाता रहूंगा
तुम्हारा स्नेह
तुम्हारे स्नेह को प्रणाम
हे मां ! तुम्हें प्रणाम।
हे मां
घबराना नहीं
तुम्हारा ११ सितंबर के
दो दिन बाद आना
वसुधैव कुटुम्बकम के गीत
गुनगुनाना
एक दिन रंग लायेगा
तब केवल मैं नहीं
हर व्यक्ति चिल्लायेगा
हिन्दी विश्व के माथे की
बिंदी है
हमारी मां
हिन्दी है।

-धीरेंद्र नाथ श्रीवास्‍तव,  सम्पादक, राष्ट्रपुरुष चन्द्रशेखर सन्सद में दो टूक,  लोकबन्धु राजनारायण विचार पथ एक, अभी उम्मीद ज़िन्दा है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *