August 28, 2019

ये बाग मेरे भी हैं

ये बाग मेरे भी हैं

रौंदो नहीं भाला जी, ये बाग मेरे भी हैं।
बेचो नहीं बरछा जी, ये बाग मेरे भी हैं।

बागों में झोपड़ी को, ताने हैं सलीके से,
फूंको नहीं गंड़सा जी, ये बाग मेरे भी हैं।

पुरखों के दरख़्तों को, ऱखकर जहाँ में गिरवी,
मत लीजिए करजा जी, ये बाग मेरे भी हैं।

माना कि थोड़े कम हैं, पर बाग की खुशबू हैं,
सच मान लो काँटा जी, ये बाग मेरे भी हैं।

कोयल हो या कबूतर, ये सबकी गुजारिश है,
हद में रहें कागा जी, ये बाग मेरे भी हैं।

लेकर मेरी उड़ाने, ये रोक टोक क्यों है,
कुछ बोलिए आका जी, ये बाग मेरे भी हैं।

पानी के बुलबुलों की, आवाज मजा देगी,
डरिये नहीं पहरा जी, ये बाग मेरे भी हैं।

धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव
सम्पादक
राष्ट्रपुरुष चन्द्रशेखर – सन्सद में दो टूक
लोकबन्धु राजनारायण – विचार पथ एक
अभी उम्मीद ज़िन्दा है

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