October 27, 2020

फाइनल में दस लाख, बाबू साहब और जंगल राज – बिहार में विधानसभा का महासमर

-फाइनल में दस लाख,
बाबू साहब और
जंगल राज
-बिहार विधानसभा का महासमर
नम्बर एक के लिए मुकाबला तेजस्वी और मोदी के बीच
-राहुल गांधी और चिराग पासवान से आगे दिख रहे हैं नीतीश कुमार

धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव

– बिहार विधानसभा चुनाव में कौन जीतेगा ? कौन हारेगा ? यह तो दस नवम्बर को पता चलेगा, लेकिन इसे लेकर जो स्थिति उभरकर सामने आ रही है, उससे स्पष्ट लग रहा है कि स्वतन्त्रता संग्राम में अग्रणीय भूमिका निभाने वाले इस राज्य में मुख्य मुकाबला दस लाख युवाओं को रोजगार देने का वायदा, बाबू साहब के सामने सीना तान कर खड़ा होने का साहस और 15 वर्ष पूर्व के जंगल राज की वापसी नहीं होने देने की इच्छा के बीच है।
इस मुकाबले में बिहार के मतदाताओं को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और उनके कुर्ते से लिपटे लोगों की अपील कि चूक हुई तो बिहार 15 वर्ष पूर्व वाली स्थिति वापस होगी, प्यारी लगी तो श्री सुशील मोदी के नेतृत्व में अभी तक छोटे भाई के रूप में नम्बर दो की जिंदगी जी रही भारतीय जनता पार्टी बिहार विधानसभा में नम्बर एक की पार्टी हो जाएगी और चिराग पासवान का उपयोग करते हुए वह पहली बार बिहार में बड़े भाई का ओहदा पाने में सफल रहेगी।
और कहीं दस लाख युवाओं को एक साथ रोजगार देने का वायदा चला, बाबू साहब के सामने स्वाभिमान से खड़े होने का साहस चला, जो तेजस्वी यादव की सभाओं में उमड़ती भीड़ से चलता दिख रहा है तो राजद विधानसभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरेगा। तेजस्वी के इस युवा तेज के बल पर कांग्रेस और माले के विधायकों की संख्या बढ़ेगी। यही नहीं सीपीएम और सीपीआई भी बिहार विधानसभा में नज़र आएगी।
इसी के साथ श्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार का कार्यकाल वाला चेप्टर भी शोध का विषय हो जाएगा।उनके लिए अच्छी खबर सिर्फ इतनी रहेगी कि इस बुरी स्थिति में भी उनके नेतृत्व वाले जद यू विधायकों की संख्या विधानसभा में राहुल गाँधी के कुशल नेतृत्व वाली कांग्रेस और रामविलास पासवान के चिराग से प्रज्ज्वलित लोजपा के विधायकों की संख्या से आगे रहेगी।
पिछले एक सप्ताह से बिहार का चुनावी ताप समझने की कोशिश कर रहा हूँ। इसे लेकर जिन लोगों से बात कर रहा हूँ, उसमें अधिसंख्य वही लोग हैं जो डेढ़ दशक पूर्व वाली न्याय यात्रा में ( दैनिक जागरण की ओर से जिसे कवर करने का अवसर मुझे मिला था ) नीतीश कुमार को सुनने के लिए घण्टों खड़े रहते थे, सुशील मोदी की तारीफ करते नहीं अघाते थे। आज स्थिति ठीक पलट है। वे लोग जानते हैं कि मैं निजी तौर पर नीतीश कुमार को बिहार का सर्वाधिक समझदार राजनेता मानता हूं, सुशील मोदी को भी पसंद करता हूँ लेकिन लोग हैं कि मेरी पसंद को मानने को छोड़िए, अब सुनने को भी तैयार नहीं हैं। ये लोग मेरी पसंद को घटिया पसन्द बता रहे हैं।
नफरत का आलम यह है कि ये लोग मेरी एक पसन्द को होम कोरेण्टाइन होने को भी भाजपा के लिए बेहतर मान रहे हैं। नीतीश कुमार जैसे तेज नेता को तीसरे स्थान पर भी देखकर भी इन लोगों को दया नहीं आ रही है। ये लोग मान रहे हैं कि जैसे यह किसी को नहीं छोड़ते हैं, उसी तरह वह भी किसी को नहीं छोड़ता है। वह इन्हें उसी मोड़ पर पहुंचा देगा जहां इस समय चिराग पासवान हैं।
वैसे सभी दल बिहार में हो रहे इस चुनाव को अपने पक्ष में करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंके हुए हैं। जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के स्वागत और मध्यप्रदेश में सत्यवादी हरिश्चंद्र के अवतार शिवराज चौहान की ताजपोशी तक हम लोग कोरोना को लेकर बेखौफ थे, उसी तरह से इस विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दलों के अधिसंख्य समर्थक कोरोना को लेकर बेखौफ नज़र आ रहे हैं। ये लोग इस चुनाव और चुनावी मुद्दों को लेकर हर गली चौराहे पर बहस करते दिख रहे हैं। इस बहस में सबके पास हार जीत के अपने अपने तर्क हैं और सभी के तरकस किसी भी चक्रव्यूह को भेदने वाले तीर हैं जो आदरणीय मोदी जी के अम्बानी अडानी से शुरू होकर प्रेमचंद होरी धनिया तक पर वार कर रहे हैं और प्यार भी।
धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव
संयोजक
लोकतन्त्र सेनानी कल्याण समिति।

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