August 3, 2021

दरिया में भी जहर भरा है

दरिया में भी जहर भरा है
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पंचायत में मौत खड़ी है, हर रस्ते पर काल खड़ा है।
बहुत बुरी थी रात पुरानी, पर यह दिन तो और बुरा है।

एक रंग है एक ढंग है, अन्तर है बारीक इसलिए,
नागनाथ या सांपनाथ में, कहना मुश्किल कौन बड़ा है।

किस हालत में कौन कहाँ है, हमसे यह हालात न पूछो,
कूएँ सूखे हैं बस्ती के, दरिया में भी जहर घुला है।

दिल्ली में यमुना का था तो, हम हँसते थे देख देखकर,
अब भोले की काशी में भी, जल के भीतर गाद भरा है।

बुरा नहीं मानों तो कह दूँ, मौसम की मनमानी से भी,
कहीं बर्फ से गात गला है, कहीं ताप से होठ जला है।

यह सच है की बदल लिया है, उसने चाल पुरानी अपनी,
मगर सोचकर चाल पुरानी, यह मन अब भी डरा डरा है।

सात दशक की ओर कदम हैं, फिर भी परिवर्तन की लेकर,
अब भी ज़िन्दा इन्कलाब है, अब भी ज़िन्दाबाद जगा है।

धीरु भाई ( धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव )
– दो टूक, 25 / 26 जून, रात एक बजकर तीस मिनट

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