September 6, 2020

जब कभी मेल और अच्छों की बात होती है

अच्छों की बात होती है

जब कभी मेल और अच्छों की बात होती है।
अब भी सबसे अधिक बच्चों की बात होती है।

तब अधिक खलता है इस माल का बेगानापन,
जब कभी हाट और मेलों की बात होती है।

जब भी मिलता कहीं परदेस में अपना कोई,
याद कर एक एक मित्रों की बात होती है।

जाने क्यों सामने आ जाता है चेहरा तेरा,

बन्द पिजड़ों में जब चिड़ियों की बात होती है।

कोई रिश्ता नहीं है फिर भी बुरा लगता है,
हवा में जब तेरी जुल्फों की बात होती है।

याद आते हैं भोलानाथ गहमरी, खामोश,
जब कभी गज़ल और गीतों की बात होती है।

जब कभी मिलते हैं जेके, दिनेश या राजू,
यादकर “शाही” को खबरों की बात होती है।

बात जब होती है अखबारों और “भैया” की,
उनके रोपे हुए पौधों की बात होती है।

बात आ जाती है “यशवन्त” के यश पर चलकर,
जब कभी दोस्ती रिश्तों की बात होती है।

धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव
सम्पादक
राष्ट्रपुरुष चन्द्रशेखर – सन्सद में दो टूक
लोकबन्धु राजनारायण – विचार पथ एक
अभी उम्मीद ज़िन्दा है

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