September 17, 2020

उन कामगारों को याद करिए जिनकी मौत का डाटा भी भारत सरकार के पास नहीं है

हास्य रसावतार सूड़ फैजाबादी कविसम्मेलनों में अक्सर नौका डूबने की एक घटना का किस्सा सुनाते थे।

इस किस्से में पंच नाविक से पूछता है- नाव में कितने लोग सवार थे?

नाविक ने जवाब दिया- छत्तीस।

पंच फिर पूछता है- इसमें से कितने डूबे?
नाविक ने जवाब दिया – सभी।

पंच ने फिर पूछता है – डूबने वालों का विवरण बताओ?

नाविक ने जवाब दिया – इसमें सिर्फ तेरह आदमी थे हुजूर। शेष सब दही, दूध, गोइंठा, लकड़ी, घास, पत्तल, सब्जी बेचने वाले मजूर थे। उनकी जानकारी नहीं है।

सूड़ जी, इस किस्से के आधार पर हास्य रस के किसी कवि के कांसेप्ट को लपेटते थे और श्रोता हँसने लगते थे, कविसम्मेलन सरस माहौल में आगे बढ़ जाता था।

सदन से निकले एक प्रश्न और उत्तर से इस किस्से की, सूड़ जी की और सरस माहौल की याद आ गई। ईश्वर सूड़ जी आत्मा को शांति दे।

जो सदन में हुआ, अब उसे पढ़े-

सदस्य का प्रश्न – लाक डाउन के दौरान रास्ते में कितने प्रवासी मजदूरों की मौत हुई?

भारत सरकार का जवाब – हमारे पास डाटा नहीं है।

सदस्य का प्रश्न- क्या पीड़ितों को मुआवजा दिया गया?

भारत सरकार का जवाब – प्रश्न ही नहीं उठता।

और सदन चल रहा है।

हम आप अपने अपने पुरखों का स्मरण कर उन्हें जल दे रहे हैं, उनकी स्मृति में भोजन निकाल रहे हैं।

हो सके तो उन कामगारों को भी याद करिए जो अपने ही देश में प्रवासी हो गए, जो घर लौटने की कोशिश में रास्ते में ही अकाल मौत के शिकार हो गए, जिनका डाटा आज भी भारत सरकार के पास नहीं है।

हो सके तो इन्हें अकाल मौत के घाट उतारने वालों की सजा के लिए अपने अपने परमेश्वर से प्रार्थना करिए।

धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव
सम्पादक
राष्ट्रपुरुष चन्द्रशेखर सन्सद में दो टूक
लोकबन्धु राजनारायण विचार पथ एक
अभी उम्मीद ज़िन्दा है

 

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