August 4, 2021

देशी बैंक का विदेशी बैंक में विलय समझ से परे – मामला लक्ष्मी विलास बैंक का / राकेश श्रीवास्तव

देशी बैंक का विदेशी बैंक में विलय समझ से परे
मामला लक्ष्मी विलास बैंक का

भारत के लक्ष्मी विलास बैंक का सिंगापुर के डीबीएस बैंक में विलय हो रहा है। यह पहला निर्णय है जिसमें रिजर्व बैंक किसी स्वदेशी बैंक का विलय विदेशी बैंक में करने जा रहा है। इस विलय से 25 शाखाओं वाले डीबीएस बैंक में लक्ष्मी विलास बैंक की 563 शाखाओं का मर्जर हो रहा है। बैकिंग क्षेत्र में रिजर्व बैंक के इस निर्णय को आश्चर्य के रूप में देखा जा रहा है।
इस आश्चर्यजनक विलय के साथ ही लक्ष्मी विलास बैंक के 4349 कर्मचारी डीबीएस बैंक के कर्मचारी हो जायेंगे। इसके लिए सिंगापुर का डीबीएस बैंक अपनी भारतीय सब्सिडियरी डीबीएस बैंक इंडिया लिमिटेड (डीबीआईएल) में 2500 करोड़ों का निवेश करेगा जिससे डीबीआईएल का दक्षिण भारत में विस्तार होगा। इससे बीस लाख जमाकर्ताओं एवं तीन लाख बीस हजार ऋणियों का जमा जमाया कारोबार इस विदेशी बैंक की झोली में आ जायेगा। इस प्रक्रिया के लिए केनरा बैंक के भूतपूर्व चेयरमैन टी एन मनोहरन को प्रशासक नियुक्त किया गया है।
लक्ष्मी विलास बैंक 2 साल से नेगेटिव रिटर्न दे रहा है। इस साल की लगातार दूसरी तिमाही मे बैंक को 396.99 करोड रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है, पर बैंक के अंदर अभी ग्राहकों का विश्वास बना हुआ था। पूंजी पर्याप्तता न होने पर भी खातेदार पैसे निकालने के लिए परेशान नहीं थे। अभी बैंक को समय दिया जा सकता था लेकिन बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 45 के अंतर्गत आरबीआई ने अपनी एक्स्ट्राऑर्डिनरी नियंत्रक शक्तियों का प्रयोग करके डीबीएस बैंक को विलय का यह तोहफा दे रही है।
देश में विदेशी बैंक की शाखा खोलने एवं बैंकों को लाइसेंस देने में कड़ी प्रक्रिया का पालन कराया जाता है परंतु यहां पर 563 शाखाओं का पूरा का पूरा बैंक ही आसान तरीके से दिया जा रहा है जबकि इस सौदे से शेयरधारकों की पूंजी समाप्त हो जाएगी। बैंक की पूरी पेड अप कैपिटल समाप्त हो जाएगी। रिटेल इन्वेस्टर्स अर्थात खुदरा या छोटे निवेशकों की पूंजी भी समाप्त हो जाएगी। बैंक की 35.75% इक्विटी भी समाप्त हो जाएगी।
बैंक के शेयर धारकों का मानना है कि अगर रिजर्व बैंक को कुछ करना ही था तो एक निर्धारित प्रक्रिया से निविदाएं आमंत्रित करके सर्वाधिक लाभ वाले प्रस्ताव पर विचार होना चाहिए था जिससे बैंक का एक सही मूल्यांकन हो सकता और उसके हिसाब से राशि मिलती। इससे छोटे निवेशकों के हित सुरक्षित रहते।
आरबीआई के इस कदम से यह संदेश जा रहा है की भारत में बैंक की शाखा खोलना चाहे जितना कठिन हो पर विदेशी बैंक और पूंजीपति यदि चाहें तो भारत में अपनी सब्सिडियरी इकाई स्थापित करके किसी देशी बैंक को उसकी समस्त शाखाओं सहित हथिया सकते हैं।

याद रहे सिंगापुर ने भारतीय स्‍टेट बैंक और आईसीआईसीआई जैसे बैंकों को अपनी पॉलिसी का कारण देते हुए अपने बाजार में विस्तार नहीं करने दिया था। फलस्वरूप भारत सरकार ने भी 2017 मे भारत में डीबीएस बैंक के रिटेल विस्‍तार को रोक दिया था। इसके बाद यह इस देशी बैंक का सिंगापुर के विदेशी बैंक में विलय कुछ अधिक आश्चर्यजनक लग रहा है।
और तब जब हम “आत्मनिर्भर भारत” के लिए प्रयत्नशील हैं। रिजर्व बैंक इस कदम से कौन सा संदेश दे रहा है, लेकिन यह विलय आत्मनिर्भर भारत के ठीक विपरीत लग रहा है।
यह सच है कि भारत सरकार इस समय निजीकरण को बढ़ावा दे रही है जबकि निजी बैंक भी लगातार फेल हो रहे हैं।
इस देश ने श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व बैंकों का राष्ट्रीयकरण देखा है। लोहा, सीमेंट, गैस, खनिज, तेल, बॉक्साइट जैसे उद्योगों का राष्ट्रीयकरण देखा है। ठीक उसके विपरीत बैकों का निजीकरण थोड़ा उलटा लगता है लेकिन विदेशी बैंक में देशी बैंक का विलय समझ से परे है।

राकेश श्रीवास्तव
लेखक लम्बे समय तक बैकिंग सेवा के अधिकारी रहे हैं

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